एडवोकेट बृज लाल तिवारी की कलम से


Source PBH | 05 May 2020 | 1102

शहादत 


 

तिरंगे की आन पर कुर्बान हो गया मैं, चट्टान सा मजबूत था बेजान हो गया मैं। मैं भी अपनी बूढ़ी मां की आंखों का तारा था, लाठी पर झुके पिता का एकमात्र सहारा था। बेटी से भी अपने मैं अंत समय मिल ना पाया, जब करीब आई भी वो तो मैं हिल तक ना पाया। घर पर दोस्त मेरे भाई भी मेरा छोटा है, तस्वीर देख मेरी वो फूट फूट कर रोता है। जाने कितनी आशाएं थीं मुझसे मेरी पत्नी को, टूटे सारे ख्वाब अचानक जड़वत सी हो गई है वो। कंधों पर मेरे ही सारे अपनों की जिम्मेदारी थी, पर इससे पहले मुझ पर वर्दी की कीमत भारी थी। सौगंध मुझे थी भारत माता का कर्ज चुकाने की, जिम्मेदारी थी मुझ पर अपना कर्तव्य निभाने की। कतरा भर भी रंज नहीं मुझको अपनी कुर्बानी का, जो राष्ट्र के काम ना आए क्या करना ऐसी जवानी का। मैं तो जान लुटा बैठा हूँ भारत माता की खातिर, हुआ दोबारा जन्म अगर तो फिर हो जाऊंगा हाजिर। मातृभूमि की इज्जत से बढ़कर है मेरी जान नहीं, कफन बना है मेरा तिरंगा इससे बढ़कर सम्मान नहीं।



अन्य ख़बरें

Beautiful cake stands from Ellementry

Ellementry

© Copyright 2019 | Pratapgarh Express. All rights reserved