घट रहे हैं हाथ:कृष्णेन्द्र राय


Dhananjay Singh | 11 Jun 2021 | 18

 एक-एक कर छोड़ रहे। 

सभी पुराना साथ।।

 कम हो रही संख्या।

घट रहे हैं हाथ।। 

नेताओं से आज। 

हुआ जहाज ख़ाली।। 

भीड़ बची है मात्र। 

और पुलाव खयाली।। 

नापसंद सिद्धान्त। 

हो रहे सब दूर।। 

जो बचे अब शेष। 

हैं दिखते मजबूर।। 

सबका अपना-अपना।

 है नफा-नुकसान।। 

चढ़ रहे उस नांव। 

बढ़े जिसमें मान।।



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