ब्रम्ह मुहूर्त पर आज भोर से पंच कोसी परिक्रमा शुरू


Dhananjay Singh | 25 Nov 2020 | 598

  अयोध्या।आज कार्तिक एकादशी के ब्रम्ह मुहूर्त में देवोत्थान एकादशी में रामनगरी की पांच कोसी परिक्रमा में स्थानीय लोग उमड़े।सुरक्षा के कड़े इंतजाम,आम नागरिकों के अलावा साधु,सन्त व अधिकारी भी कर रहे परिक्रमा। इस बार कोविड 19 के कारण जिला प्रशासन की अपील पर बाहरी लोगों का प्रवेश नही हो रहा। कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवोथानी एकादशी के रूप में भी जाना जाता है। शास्त्रों के मुताबिक, आज की तारीख में भगवान् विष्णु अपनी योग निद्रा से जागे थे। इस कारण इस तिथि को देवोथानी एकादशी के रूप में भी जाना जाता है। इस पुण्यतिथि पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में पंचकोसी परिक्रमा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस परिक्रमा को करने से मनुष्य के पाप मिट जाते हैं और उसे सुख-शान्ति की प्राप्ति होती है। क्यों करते हैं लोग पंचकोसी परिक्रमा अयोध्या नगरी के चतुर्दिक गोलाकार स्थिति में होने वाली इस पांच कोसी की परिक्रमा की परिधि में भगवान श्रीराम की जन्मस्थली सहित हनुमान गढ़ी, कनक भवन, नागेश्वरनाथ और अयोध्या के करीब 6 हज़ार मंदिरों की परिक्रमा हो जाती है। ऐसी मान्यता है कि एक-एक मंदिर में परिक्रमा करने के जगह यदि देवोथानी एकादशी पर पंचकोसी परिक्रमा कर ली जाए तो संपूर्ण अयोध्या और उसमें स्थित सभी सिध्पीठो की परिक्रमा संपूर्ण हो जाती है। ऐसी मान्यता के चलते लाखों की संख्या में श्रद्धालु अयोध्या में पंचकोसी परिक्रमा करते है। कब लिया था भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार प्राचीन कथाओं के अनुसार, एक समय संखासुर नामक राक्षक ने त्रिलोक पर अपना अधिपत्य जमा लिया था। इसके बाद डरे हुए देवतागण भगवान श्रीहरी के पास पहुंचे और स्तुति कर उन्हें जगाया। इसके बाद भगवान श्रीहरी ने सारा वृतांत सुनने के बाद उन्हें आश्वस्त किया। इसी बीच संखासुर ने देवताओं को कमजोर करने के लिए देवताओं के शक्ति के स्त्रोत वेद मंत्रो के हरण का प्रयास करने का प्रयास करने लगा। इससे वेद मंत्रों ने स्वयं को जल में सुरक्षित कर लिया लेकिन संखासुर को इस बात की यह जानकारी मिल गयी कि वेदमंत्र जल में प्रवेश कर गए हैं तो उसने मछली का रूप धर के जल में वेदमंत्रों को ढूंढना शुरू कर दिया। इसके बाद भगवान श्रीहरी ने दिव्य नेत्रों से संखासुर का पता लगाया और स्वयं भी मत्स्य अवतार धारण कर संखासुर का वध कर दिया और वेद मंत्रों की रक्षा कर देवताओं को उनका वैभव लौटाया। चूंकि, इसी तिथि में भगवान योग निद्रा से जागे थे। इसलिए इस तिथि को देवोथानी एकादशी के रूप में भी जाना जाता है।



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