हम कभी क्या फिर हाथ मिला पाएंगे


Source PBH | 29 Aug 2020 | 224

धनंजय सिंह

 

 हाथ मिलाने की परंपरा लंबे समय से कायम है। 60 के दशक के शिष्टाचार के संबोधन हैलो के समय भी ये कायम थी,90 के दशक में जब हाई फाइव(किसी के समर्थन में उसकी हथेली से अपनी हथेली टकराना)लोक प्रिय हुआ तब भी हाथ मिलाने का जज़्बा कम नही हुआ और न ही पिछले दशक में हाथ मिलाने में कुछ कमी आई।जब गले मिलने की परंपरा को खेल के मैदान में बराक ओबामा के राष्ट्रपति के राष्ट्रपति काल में व्हाइट हाउस तक फलते फूलता देखा गया। लेकिन कॉर्पोरेट दौर का ये शिष्टाचार क्या कोरोना वायरस को मात दे पाएगा।छोटी अवधि में यह संभावना धूमिल ही लग रही है।हम इस परंपरा से बाहर निकलने लगे है।अमेरिका में संक्रामक बीमारियों के शीर्ष विशेषज्ञ डाॅक्टर एंथोनी फाउची कहते है,क्योंकि हाथ मिलाना सांस से जुड़ी बीमारी के फैलने का बड़ा जरिया है।काॅरपोरेट दौर के शिष्टाचार की इस परंपरा के बारे में श्रद्धांजलियां लिखी गईं और टाइम,वायर्ड और बीबीसी जैसों ने भविष्यवाणी कर दी कि हाथ मिलाना अब अतीत की बातें रह जाएगा। सौजन्यता की इस अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा को अब खतरनाक माना जा रहा है। कारोबारी जगत में पारंपरिक रूप से हाथ मिलाने को एक दूसरे का आदर करने के तौर पर माना जाता रहा है। अगर आज आप किसी के सामने अपना हाथ बढ़ाते है तो दूसरा ही अर्थ माना जाएगा।लाॅकडाउन में आधा साल गुजर जाने के बाद ये बेहद प्रासंगिक सवाल है।हाथ मिलाने की परंपरा मर चुकी है या फिर भूमिगत है।हालांकि संकट के चरम के समय बिना विचारे की गईं भविष्यवाणी कईं बार गलत भी साबित हो जाती है।इसी संदर्भ में 9/11 के आतंकी हमले को याद करना चाहिए जिसके बाद कहा गया था कि अमेरिका सहित पूरा विश्व अब आतंकी दहशत में दिन गुजारेगा लेकिन वो आशंका गलत साबित रही।ऐसे ही वैश्विक संकट के बीच हाथ मिलाने के बारे में भविष्यवाणी आने वाले दिनों में गलत साबित हो सकती है।ये याद रखना चाहिए कि हाथ मिलाने की परंपरा इलियड के दौर चलती चली आ रही है।युध्द जैसे हालात में हाथ मिलाने को शांति की एक मुद्रा के रूप में देखा गया।हाथ मिलाने का मतलब ये था कि सामने वाला अपने हाथ में छुरा छुपाकर नही रखा है।लेकिन अभी का समय भिन्न है जब असंख्य लोग पिछले कईं महीनों से घर से काम कर रहे और खाली ऑफिस हाॅलीवुड फिल्मों के सेट की तरह लगते है।हमे मौजूदा चुनौती का सामना करना चाहिए,अगर आप पूरे दिन में सिर्फ अपने परिवार के सदस्यों,पालतू कुत्ते या फूड डेलिवरी बाॅय से मिलते है तो आपको हाथ मिलाने की वैकल्पिक मुद्रा के लिए चिंता करने की जरूरत नही हैं,क्योंकि इनका सामना करते हुए इसकी जरूरत नही पड़ेगी।पर इसका मतलब ये तो नही है कि बिजनेस मीटिंग में या व्यक्तिगत जीवन में अजनबी की दूसरे अजनबी से मुलाकात के दौरान शिष्टाचार की जरूरत नही पड़ेगी।इस लिए लिहाजा अभिवादन की आवश्यकता तो खैर पड़ेगी ही। वैसे क्या हाथ मिलाने की परंपरा वापस लौटेगी या इस कोरोना महामारी से डरकर और सबक लेते हुए हम अभिवादन का कोई दूसरा रास्ता खोज लेंगे।कोहनी से कोहनी मिलाकर अभिवादन करना एक छोटे दौर में चलन आया था लेकिन इसे बेहद औपचारिक और कईं बार तो आक्रामक देहभाषा के तौर पर भी आंका गया।एक समय अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों के बीच फुट शेक भी चलन में था जिसमे पैर से पैर मिलाकर अभिवादन किया जाता था।लेकिन इसे न केवल विचित्र कहकर खारिज कर दिया गया बल्कि अभिवादन की इस मुद्रा को दूर से देखकर लगता था कि फुटबॉल का कोई मैच स्लो मोशन चल रहा है।चूंकि ये विकल्प उतना प्रभावी नही है,हाथ मिलाने का कोई रास्ता खोजना ही होगा जो सामाजिक तौर पर स्वीकार्य हो और जिसे देखकर नही लगता हो हम कोई मूक फिल्म देख रहे है।लेकिन आखिर ऐसा विकल्प हमे मिलेगा कहा।इसके लिए हम कैपिटल हिल का रूख कर सकते है जहां डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता अलेक्जेंड्रिया ओकासियो कोर्टेज कोरोना उत्तर काल के अभिवादन के लिए दोनो हाथ मिलाकर दिल बनाने की मुद्रा के तौर पर लोकप्रिय बनाने में लगी हुई हैं।मुस्लिम देशों में ये अभिवादन मुद्रा बेहद लोकप्रिय है।ये देहभाषा गर्मजोशी से भरी हुई हैं और इसमे विनम्रता का पुट भी है। हाथ मिलाना स्थगित होने से लोगों में दूरी का एहसास तो होगा लेकिन समय का तकाजा यही है कि हम इसके विकल्प के बारे में सोचे।



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