पलायन गांवों से कई स्तरों पर हैं


Dhananjay Singh | 18 Aug 2020 | 291

शहरीकरण की शुरूआत होते ही गांवों से पलायन हमारी गांव की दुनिया में निरंतर विषबेल की तरह विस्तारित होता गया।तीन-चार दशक पहले तक मझोले व छोटे किसानों के पास जो खेतिहर जमीन थी,उसका रकबा व दूसरी पीढ़ी तक आते-आते तेजी से छिनने लगा। सत्तर के दशक में गांव अपने आकार-प्रकार में सही सलामत व आत्मनिर्भर इकाई थे।कस्बों व शहरों की तरफ उनका रूझान इतना था कि वे धान व गेहूं जैसी अपनी कुछ तैयार फसलों को वहां की आढ़तों पर बेचने के लिए लेकर जाते थे।शेष के लिए निकट के देहात में जुड़ने वाली सप्ताह की हाट सबसे अच्छी जगह थी।उन दिनों बाजार खुद चलकर गांव आता था।रोजमर्रा की इस्तेमाल की अधिकांश चीजें गांव में पैदा की जाती थी।शहर अपनी खाद्य संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गांव में फसलों के कटने का बड़े बेसब्री से इंतज़ार करते थे।पर धीरे-धीरे खेती के तौर तरीके बदल गये और मशीनों का उपयोग बढ़ा।इससे खेती के काम में मनुष्य की सहभागिता घटती चली गयी।खेती की जमीन कम होने साथ-साथ कृषि कार्य मे मनुष्य- श्रम की आवश्यकताओं का घटते चले जाना गांवों से पलायन अहम कारण बना। फैक्टरियां व उद्योग-धंधे शहरों में लगने से किसानों की बेरोजगार युवा पीढ़ी ने काम की तलाश में उस तरफ जाना शुरू कर दिया।यदि ऐसे कल-कारखाने गांवों में स्थापित किए जाते तो इससे गांव से होता पलायन रूकने में सहूलियत होती।शहरों ने ग्रामीण युवाओं को खूब अपनी तरफ आकर्षित किया।सिनेमा व बाजार के साथ-साथ आधुनिक जीवन शैली ने भी नई पीढ़ी को अपनी तरफ खूब खींचा।संगठित परिवार टूटने पर घर के सदस्यों के बीच आपसी सौहार्द भी कम हुआ।छोटे किसानों के पास जो थोड़ी बहुत जमीन बची,वह जमीन गुजर-बसर करने के लिए अनाज देने में असहाय हो गयी। ऐसे में छोटे जमीन वाले किसानों को शहरों की तरफ मजदूरी करने के लिए भागना पड़ा।ग्रमीण इलाकों से होने वाला पलायन पहले धीरे गति से और सामयिक हुआ।इसके बाद वे लंबे समय के लिए दूर के शहरों में दमघोटने वाली कोठरियां किराये पर लेकर रहने लगे। लेकिन शहर से उनका रिश्ता आत्मिक नही हो पाया।कभी-कभी होली व दिवाली पर मेहमानों व अजनबियों की तरह गांव आते,वे न गांव के रहते न शहर के हो पाते।जो सदस्य गांव में रह गए,वे भी नही चाहते कि शहर में रहने के बाद उनके अपने भी नही चाहते कि शहर में रहने के बाद उनके अपने लोग पुरानी देहरी पर लौटें। गांव से होने वाला एक और दैनिक पलायन की प्रायः हम अनदेखी कर देते हैं।सुबह न जाने कितने किसान पुत्र झोले में रखी पोटली में चार रोटी और सब्जी बांधकर निजी बसों में आधा किराया देकर बसों की छतों पर बैठकर हर रोज शहरों के खास चौराहों पर अपना श्रम बेचने के लिए आकर खड़े हो जाते है। इंडिया शाइनिंग,ग्रोथ,विकास,तरक्की,अच्छे दिन जैसे खोखले नारों ने बेरोजगार ग्रामीणों को बहुत भरमाया,और बेरोजगारों को जीने लायक ठिकाना नही दिया। देहात के मजदूरों ने शहरों को उनका चेहरा सौपा और रोशनी व रंगत दी,पर कोरोना वायरस की महामारी से बचाव के लिए लागू हुए लाॅकडाउन के चलते काम न होने की स्थिति में जब वे सर पर पोटलियों और छोटे-छोटे दुधमुंहे बच्चों को कंधों पर लादे विस्थापित होकर थके-मांदे लौट रहे थे तब उन्हें किसी ने नही रोका।गांवों से एक और सामूहिक पलायन कुछ भिन्न तरीके का था।सड़क या राजमार्गों के किनारे अथवा विस्तारित होते शहर शहरों की चपेट में आने वाले लाखों को पूंजी ने बेदखल कर दिया। गांव अब प्रेमचंद और रेणु के जमाने वाला नही रहा।वह कथाकर पूरन हार्डी की बुड़ान का मर-डूब चुका गांव है,जिसकी आवाज भी हुक्मरान नही सुनते।पुरानी ग्राम कथाओं व उपन्यासोंके जरिए मौजूदा गांव की बनावट और उसके नितांत जटिल होते चरित्र को नही समझा जा सकता।शहरों के आलीशान फ्लैटों में रहकर गांव के वर्तमान को चीन्हना और उसकी समस्याओं से रूबरू होना नितांत कठिन हैं।संसदीय राजनीति ने भी विगत वर्षों में गांव के चेहरे को बहुत विकृत किया है। (अहा ग्राम्य जीवन भी किया है) की कविता पंक्ति को अब उलट कर देखना होगा।एक समय गांव में जातिगत विभाजन तो था, पर सांप्रदायिकता का निशान नही था,लेकिन अब ऐसा नही हैं। विकास की ईमानदार दीर्घकालिक ग्रामीणोन्मुखी कोशिशें ही देहाती जीवन को पलायन के अभिशाप से मुक्त कर सकती है।



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